क्वालिटी टाइम देकर बच्चो का स्क्रीन टाइम कम करें
क्वालिटी टाइम देकर बच्चो का स्क्रीन टाइम कम करें
आखिर क्या है समस्या-
पिछले
दिनों अपनी सखी के यहाँ बैठी थी देखा उनका पोता दोपहर स्कूल से आया, बेहद उतावला था अपने स्कूल की दिन चर्या को लेकर सो
सबसे पहले दादी के पास आया ,
“दादी-दादी सुनों न ....” वह आगे कुछ कह पता कि सखी बोल पड़ी ,
“बच्चे! देख रहे हो न मैं अपनी फ्रैंड से बात कर
रही हूँ ,बाद में सुनती हूँ
तुम्हारी बातें|” वह एक पल
को मायूस हो मम्मी के कमरे की और चल दिया मानो पहले से ही नाउम्मीदी का अंदेशा हो | तभी सखी ने कहा देखो अपनी माँ के पास
गया है सुनाने मगर वो झिड़ककर उसे वापस भेज देगी | सारा दिन मोबाईल पर लगी होती है | स्कूल से आकर बच्चा मेरे पास ही रहता है
| तभी देखा उस बच्चे
ने चुपचाप दादी का मोबाईल उठाया और गेम खेलने लगा | अब दादी की बैचेनी बढ़ गई ,
“देख रही हो, इसके स्कूल से आने के बाद मेरा फोन मेरा नहीं रह जाता , सारा दिन अब मोबाईल से चिपका रहेगा |”
दोषी कौन ?
मेरी समझ में ये नहीं आया कि आखिर बच्चे का दोष क्या है ? वह अगर मोबाईल या कंप्यूटरस्क्रीन से चिपका है तो उसके लिए जिम्मेदार कौन है ? कम से कम बच्चा तो नहीं | वह तो आया था आपके साथ समय व्यतीत करने आपने उसे समय नहीं दिया | ऐसे में उसे जो उचित लगा अपने लिए उसने वह फैसला लिया | यहाँ तो दादी और मम्मी है घर में उसकी सहायता के लिए कई घरों में जब बच्चे स्कूल से लौटते हैं तो कोई नहीं होता उनसे बात करने के लिए ...अगर कोई उनका हमसफर होता है तो केवल मोबाईल या कंप्यूटर |यह उनकी विवशता है जो समय के साथ व्यसन का रूप धारण कर लेती है |
जिद सोच समझकर पूरी करें -
कईअभिभावकबच्चों की जिद पूरी करते हैं और सोचते हैं हममाता पिता की भूमिका सफलता से निभा रहे हैं | लेकिन जब यही जिद उन्हें तकलीफ देने लगती हैं , परिजनों के बीच शर्मिंदा करती हैं तब भी वे बच्चे को ही दोष देते हैं | नहीं देख पाते उसे जिद्दी बनाया किसने ? बच्चे की हर ख्वाहिश पूरी करना ही अच्छे माता पिता की निशानी नहीं होती अपितु क्या उसके लिए हितकर है देखना आवश्यक होता है | कारण बालक तो नादाँ है नहीं जाता वह जो वास्तु मांग रहा है वह उसके लिए कितनी हितकर या अहितकारी है , सोचना तो आपको है|
कौन है जिम्मेदार -
बालक ये जिद कहीं
से सीख कर नहीं आया | सोचे जरा
उसमें यह आदत कैसे आई ? प्राय: ऐसा होता है कि बच्चा भोजन के समय कुछ
और मांग रहा है यथा बिस्किट, आइसक्रीम... माँ मन भी करती है लेकिन तभी दादी या बुआ | या बार-बार कहने पर माँ जो किसी कम में लगी है
पीछा छुड़ाने के उद्देश्य से बिस्किट का पूरा डिब्बा ही यह कहकर उसके हाथ में पकड़ा
देती है ,
“ले खा ... मर , मुझे क्या |” यहाँ बच्चा आपकी कमजोर नब्ज पहचान गया | पहली-यह कि जो वस्तु माँ न दे उसे दादी या बुआ से लिया जा सकता है | दूसरा – अगर एक बार में वास्तु न मिले तो बार-बार कहो ,इससे माँ चिढ़कर ही सही दे तो देगी | इसी तरह कई बच्चे जमीं पर लोट लगाकर, तो कई अपना सर जमीं पर पटककर भी अपनी जिद मनवा लेते हैं |
माताओं की भूमिका -
इस बात से इंकार
नहीं कि बालक माता और पिता दोनों की ही जिम्मेदारी है | किन्तु बच्चे प्राय: माता से अधिक करीब होते हैं फिर चाहे
वोगृहिणी हो या वर्किंग | गृहिणी तो
जैसे तैसे कुछ समय बच्चे को दे ही देती है अमूमन यह देखा गया है कि कामकाजी माताएँ
बच्चो को समय नहीं दे पातींयह टीस उनके मन में रहती होगी जिससे उभरने वह बच्चे को
तरह-तरह के उपहार देती
हैं ताकि बच्चा खुश रहे | यह बच्चे
की ख़ुशी नहीं है ...उसके लिए
माता पिता का सानिध्य बहुत आवश्यक है अगरमाँ कामकाजी है तो उसे गिल्ट अनुभव करने
की कोई आवश्यकता नहीं कि छोटे बच्चे को छोड़ कर जा रही है, पहले दिल से यह भाव निकाले क्योंकि
आपके एक्स्पोज़र से बच्चे को लाभ मिलेगा|
पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ के बीच रेखा हो -
माता-पिता को चाहिए कि अपनी पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ के बीच बाउंड्री का ध्यान रखें |उनसे बात करते वक्त स्वयंलैपटॉप या मोबाइल से दूरी बनाकर रखें, उसे एहसास दिलाएं कि यह वक्त आपका केवल उसके लिए है| आवश्यक नहीं आप बच्चे के साथ पूरा दिन व्यतीत करें , भले ही एक घंटे का समय दें, घंटे भर साथ रहने वाली माताएं भी अच्छी माता साबित हो सकती हैं | प्रश्न होता है आप कितना करीब हैं बच्चों के,उसकी जिंदगी के बारे में जान रहे हैं ,अच्छे जीवन मूल्य से दे रहे हैं तो इससे बेहतर और कुछ नहीं |
घर बच्चे की पहली पाठशाला है-
यादरखें घर बच्चे की पहली पाठशाला है ,बच्चे का आचार-व्यवहार भविष्य मेंजो भी होगा उसकी नीव
घर से तैयार होती है | अत: चाहते हैं कि आपका बच्चा स्क्रीन का
मरीज न बने तो आप उसे अपना कुछ समय दें ,उसे जीवन सम्बन्धी व्यावहारिक ज्ञान दें ताकि बच्चे
को अकेलापन न लगे | आरम्भ में
वह अपना समय व्यतीत करने के लिए स्क्रीन को चुनता है फिर वह उसका व्यसनी हो जाता
है | बेहतर होगा आप उसे
अपने होने का एहसास कराएँ देखियेयह समस्या कैसे हल होती है |
डा. लता अग्रवाल ‘तुलजा’
भोपाल

शानदार
ReplyDelete